Saturday, February 13, 2010

Devdas

एक statement आई थी की "हर भारतीय के दिल में एक देवदास बसता है"| तो मैंने उस देवदास को खोजने की कोशिश की| हमारे देवदास को | IIT Kharagpur के देवदास को|
लेकिन कहानी में थोडा ट्विस्ट है| हमारे देवदास के पास च से चुन्नी बाबु नहीं हैं| उनके पास च से चंद्रमुखी भी नहीं है| पर उनके पास फ से Faculty advisor हैं| उनके पास प से पारो भी नहीं है| पर वो प से पीते बहुत हैं| और जब वो प से पीते बहुत हैं तो हमारे फ से Faculty advisor जानना चाहते हैं की क्यों पीते हैं वो इतना| तो हमारे देवदास बाबु बस यही कह पाते हैं|
हजारों courses इस कॉलेज में
हर course तोड़ने में दम निकले
बहुत लिखा पपेरों में हमने
ग्रेड फिर भी पंजी से कम निकले|

आओ आओ देवदास बाबु| भाई तुमने तो कमाल कर दिया| हम तो सोचते थे के फ से फायनल इयर में तुम फ से फर्स्ट आओगे पर तुम तो फ से फेल हो गए| भई इतने दिन हो गए कभी पढाई की याद नहीं आई|

ऊँहूँ... याद तो उस बात की आती है जिस बात में कोई बात हो| पर इस इंजीनियरिंग की पढाई में तो कोई बात ही नहीं है| अब आप ही देख लीजिये| एक बच्चे के पांच साल के curriculum में दसियो प्रोफेस्सोर्स, सैकड़ों कोउर्सेस, हजारों एक्साम्स, लाखो क्लास्सेस, और कडोडो टेंशन| पर पूरे पांच साल के कॉलेज लाइफ में एक भी बंदी नहीं| एक भी बंदी नहीं और आप कहते हैं पढाई की कभी याद नहीं आई| कैसे आती पढाई की याद जब CCD में हमेशा लोग खूबसूरत बालिकाओं के साथ बैठे रहते हैं| अरे CCD को छोड़ भी दें तो पार्क, LS, और सहारा तक के हर कोने में बैठे रहते हैं| आप ही बताइए कैसे आती पढाई की याद| वैसे एक बात होती थी तो.... ऊँहूँ... दो बात होती थी तो पढाई की बहुत याद आती थी|

दो बार! ये तो बहुत अच्छी बात है| लोगो को एक बार भी नहीं आती है तुम्हे दो बार याद आई| जड़ा बताओ कब कब याद आती थी|

पढाई की बहुत याद आती थी, जब जब grades निकलते थे| लोग कहते हैं न के जब पहली बार प्यार होता है तो कुछ कुछ होता है| मैं कहता हूँ कुछ कुछ तो तब ही हो जाता है जब deregistration की धमकी मिलती है| और जब पहला फक्का लगता है तो कुछ कुछ नहीं बहुत कुछ हो जाता है| दुसरे फक्के में तो मानो सब कुछ हो जाता है|

रिजल्ट की बात समझ में आती है| दूसरी बार कब याद आती थी पढाई की?

दूसरी बार भी बहुत याद आती थी| जब जब ये अखबार वाले हमारे प्लेसमेंट की खबर निकालते थे| पर हमें तो प्लेसमेंट मिलेगी नहीं|

कैसे मिलेगी तुम्हे प्लेसमेंट| पढाई तो तुमने कभी की नहीं| कोई क्यों देगा तुम्हे प्लेसमेंट|

पढना लिखना तो हम कब का छोर चुके|
अब तो professors की दया पे ऐतबार करते हैं|
पर क्या कहे उन कमबख्त पत्थर दिल को|
जो हमारी डूबती नैया को कभी भी पार नहीं करते|

भई कोई क्यों करेगा तुम्हारी डूबती नैया को पार|

मेरी बात पूरी होने दीजिये सर|
Department के subject में कोई फक्का भी दे तो कोई गम नहीं|
दर्द तो तब होता है जब RD में C से वार करते हैं|

जब इतनी ही दिक्कत है तुम्हे यहाँ तो कॉलेज छोड़ क्यों नहीं देते| छोड़ दो कॉलेज| चले जाओ यहाँ से|


admission के वक़्त बाबूजी ने कहा दोस्तों का साथ छोर दो|
उन्ही दोस्तों ने कहा डिपार्टमेंट की सारी क्लास छोर दो|
क्लास छोड़ी तो प्रोफेस्सोर्स ने कहा अब ग्रेड का ख्याल छोर दो|
आज आपने भी कह दिया, ये कॉलेज ही छोर दो|
कॉलेज तो हम तब छोड़ेंगे जब director साहब खुद आ के हमसे कहेंगे के अब इंजीनियरिंग का ख्याल छोर दो|

(Original concept : "Deepak Dhamija, IIMC")

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