सत्य क्या है? जो देखा, जो सुना, बिना नमक मिर्च लगाये बोल डाला| यही सत्य है ना? परन्तु आज मैं इस सत्य की बात नहीं कर रहा हूँ| उस सत्य की बात नहीं कर रहा जो धर्मराज युधिष्ठिर और सत्यवादी हरिश्चंद्र अपने जीवन काल में कहते रहे| बात कर रहा हूँ उस सत्य की जो इतिहास बदलने की क्षमता रखता है| बात कर रहा हूँ उस सत्य की जो एक झलक दिखा कर हमें चकाचौंध कर देता है| बात कर रहा हूँ उस सत्य की जो हमारे समझ के बाहर है| बात कर रहा हूँ उस सत्य की जिसने किसी कवि को यह लिखने के लिए मजबूर कर दिया|
"रे रोक युधिष्ठिर को ना यहाँ,
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर फिरा हमें गाण्डीव गदा,
लौटा दे अर्जुन भीम वीर"
ऐसा क्यों है की जो सत्य वही होता है जो विजेता लिखता है? क्या सत्य वो नहीं था जो दुर्योधन ने "महाभारत कि एक सांझ" में कहा? अगर वो सच है तो इतिहास सुयोधन को दुर्योधन क्यों कहती है? क्या वो सत्य नहीं था जो कर्ण ने परशुराम से कहा था? फिर कर्ण को क्यों श्राप मिला? क्या वो सत्य नहीं था जो सीता माता ने युद्ध के बाद श्री राम से कहा? फिर सीता माता की अग्नि परीक्षा क्यों हुई? परीक्षा सत्य कि ही क्यों होती है? वही सत्य क्यों उजागर होता है जो शक्तिशाली चाहते हैं? और अगर सत्य शक्ति है तो युद्ध भी एक सत्य है| और युद्ध से बड़ा सत्य है विजय| परन्तु अपने जेहन में झाँक के देखे तो समझ में आता है कि युद्ध कैसे सत्य हो सकता है| जंग तो चाँद रोज़ होती है, जिन्दगी बरसों तलक रोती है| फिर क्या फर्क पड़ता है कि जीत किसकी हुई है, हारी तो इंसानियत है| हम अपने अपने खेतों में गेहूं कि जगह चावल कि जगह बन्दूकें क्यों बोते हैं, जब दोनों कि ही गलियों में कुछ भूखे बच्चे सोते हैं| दोहरा मापदंड क्यों है इतिहास में? अगर प्यार सत्य है तो ट्रॉय का युद्ध क्यों हुआ? जयचंद, जयचंद क्यों बना? अगर शांति सत्य तो युद्ध क्यों होते हैं आतंकवाद क्यों है? अगर शक्ति सत्य है तो आज तक दुनिया क्यों बची हुई है? जवाब वहीँ से आता है जहाँ से सवाल आया है|है ऐसी रेखा बनी नहीं जो बाँट सके, है सत्य क्या और असत्य क्या, है पाप क्या और पुण्य क्या|
जो मेरे लिए सत्य है वो किसी और के लिए मिथ्या है| जो मेरे लिए सही है वो किसी और के लिए गलत है| और अगर मैं शक्तिशाली हूँ तो दुनिया मेरा कहा सच मानेगी| भले ही वो कितना ही बड़ा झूठ हो, या गलत हो| आज कि गलती, कल का कानून, परसों कि संस्कृति|वो कहतें हैं "मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी" | ऐसी क्या मजबूरी रही होगी जो राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने "हारे को हरिनाम" लिख दिया और हरिवंश राय बच्चन ने "मधुशाला"| ऐसी भी क्या मजबूरी रही होगी महाकवि कबीरदास कि जो उन्होंने ये कह दिया|
नारी कि झाई पडत अँधा होत भुजंग
कबिरा तिन कि क्या गति जो नित नारी के संग|
और अगर सत्य सच में मजबूरी के कारण बाहर आता है तो सत्य से बड़ा विध्वंसक कुछ भी नहीं है| युद्ध, महामारी, प्रलय कुछ भी नहीं| तब तो दिनकर के ओजस्वी कलम से, जिससे "रश्मिरथी" निकली है उसी से निकली है "हारे को हरिनाम"| जब दिनकर जैसा योधा हार सकता है, जब कबीरदास नारी पर ऐसे वयंग्य कर सकते हैं तब उससे अच्छा है कि सत्य बाहर आये ही नहीं| तब तो महात्मा गाँधी ने कहा|सत्यम ब्रूयात प्रियम ब्रूयात, ना ब्रूयात सत्यम अप्रियम|
तो आख़िरकार सत्य है क्या? सत्य चंदवरदाई के मुह से निकली हुई वो वाणी है जो हारे हुए अंधे प्रिथिविराज चौहान को जीतने की आशा दे| "चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रवान, एते पे सुल्तान है मत चूको चौहान"| सत्य शहीद भगत के मुह से निकली हुई वो गीत है जिसने पूरे भारत को एक कर दिया| "मेरा रंग दे बसंती चोला माई रंग दे"| सत्य लता मंगेशकर के मुह से निकला वो गीत है जिसने हर भारतीय को रुला दिया| "ए मेरे वतन के लोगो जरा आँख में भर लो पानी"| सत्य वो है जो हमें जोड़े| सत्य वो है जो हमें आशा दे| सत्य वो है जो ये कहे "मुंबई हर भारतवासी का है"|सत्य वो है जो दुनिया में शान्ति लाये| सत्य वो नहीं जो शक्तिशली कहे, सत्य वो है जो आम आदमी को शक्तिशाली बनाये| सत्य वो नहीं है जिसे हम मजबूरी में कहे, सत्य वो जो हमारी मजबूरी मिटाए| सत्य वो नहीं जो इतिहास में कहा गया है| सत्य वो है जो इतिहास बनाये| सत्य वो है जो जिस भी परिस्थिति में कहा जाये उसे सम्मान मिले, तालियों की गर्गराहट मिले| सत्य वो नहीं है जो राहें कठिन बनाये सत्य वो है जो जिन्दगी आसन बनाये|